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Ramdevra Temple


Ramdevra Temple, Pokaran, Rajasthan

Ramdevera is Situated about 12 Kms to the north of Pokhran, the village of Ramdevra known after Baba Ramdev, a Tanwar Rajput and a saint who took Samadhi (conscious exit from the mortal body) in 1458 A. D. He had miraculous powers and his fame reached far and wide. Legend goes that five Pirs(saints) from Mecca came here to test his power and after being convinced, paid their homage to him. Since then he is venerated by Muslims also as Ram Shah Pir. The Hindus regard him as an incarnation of Lord Krishna.

Near the village, there is a tank known as Ramsar tank which is believed to have been constructed by Baba Ramdev himself. A large step well, the Parcha Baori is also situated nearby. Baba Ram Dev believed in the equality of all human beings, both high and low, rich and poor. He helped the down-trodden by granting them their wishes.Maharaja Ganga Singh of Bikaner constructed a temple around the Samadhi in 1931 A.D. Rice, coconuts, churma and wooden horses (toys) are offered to Ramdevji by the devotees.
A large fair is held here from Bhadon Sudi 2 to Bhadon Sudi 11 (Aug - Sept) which is attended by lakh of devotees who come in large groups from far and wide. Irrespective of their caste, creed or religious affiliations, these devotees throng the shrine dedicated to the saint. These groups organise night long singing of bhajans and kirtans to pay homage to Baba. 
How to Reach:
Ramdevra village lies about 12 kms. from Pokhran in Jaisalmer district. Pokhran is connected to Jodhpur by a metalled road as well as by Rail. Ramdevra can be reached from Jodhpur and Pokhran by bus.

 

इतिहास :
 

पिछम धरा रा पीर, धोरा री धरती रा पालनहार श्री बाबा रामदेव जी के इस कलयुग मे अवतार के पीछे एक प्रसंग जुडा हुआ है। कहते है जब-जब धरती पाप का भार बढ़ता है, मानवता पर खतरा आता है, तब-तब इस धरती पर भगवान ने अवतार लिया है । ऐसा ही कुछ 15 वीं सदी मे हुआ |


राजा अजमल जी अपने राज्य मे अपनी प्रजा के साथ सुख-शान्ति पूर्वक राज्य कर रहे थे, उन्हे केवल एक ही बात की कमी थी, वह थी पुत्ररत्न ! वे सर्वसम्पन्न होते हुए भी अपनी निःसंतानता के कारण चिन्तित रहते थे । वे  }kfjdk/kh’k जी के परम् भक्त थे। कहते है वे 12 (बारह) बार }kfjdkपूरी  जा चुके थे और वे जब भी }kfjdk जाते अपने राज्य की सुख-शान्ति की मनोकामना करते ।

 

     एक बार अच्छी बारिश होने पर उन्होने}kfjdk/kh’k के लिये अपने महल से प्रस्थान किया। उसी समय कुछ किसान अपने खेतो कि तरफ हल लिये जा रहे थे। उन किसानो ने अजमल जी को देखकर अपशकुन मानते हुए (एक अंधविश्वास है की अगर कोई

शुभ कार्य हेतु जाये और निःसंतान सामने आ जाये तो अपशकुन होता है) वापिस अपने घरो की ओर जाने लगे। तभी अजमल जी ने उन्हे यह पूछा कि इतनी अच्छी बरखा होने पर भी आप वापिस क्यो जा रहे हो, तभी किसानो ने बताया कि आप की निःसन्तानता हमारे लिये अपशकुन है, अतः खेतो मे जाने का कोई आशय नही रहा । यह सुनकर अजमालजी को मन ही मन बहुत दुःख हुआ परन्तु दयालु प्रवृति के होने के कारण उन्होने किसानो को सजा न देकर उनसे हाथ जोड़कर क्षमा माँगी व विदा ली ।

 

अजमाल जी जब   }kfjdk पहुंचे तब उन्होने }kfjdk/kh’k की मूर्ति के समक्ष अपना दुःख प्रकट किया। परन्तु उस मूर्ति से कोई प्रत्युत्तर न पाकर अजमल जी क्रोधित हो गये और उस पत्थर की मूर्ति पर लड्डू का प्रहार कर दिया। यह सब देखकर पुजारी वहा पर

आये और अजमाल जी को पागल समझ कर कह दिया की भगवान तो इस पत्थर कि मूर्ति मे नही है, भगवान तो क्षीर सागर की कोख मे शेषनाग की शय्या पर विश्राम कर रहे है। अजमल जी उस पुजारी की बातों मे आ गये और क्षीर सागर मे भगवान के दर्शन प्राप्त करने के लिये डुबकी लगा दी ।


लेकिन भगवान का चमत्कार देखो, विष्णु भगवान ने उस पुजारी के कहे अनुसार ही शेषनाग की शय्या पर अजमाल जी को दर्शन दिये यह देख अजमल जी प्रस्सन हुए, परन्तु विष्णु जी के सिर पर बंधी पट्टी को देखकर चिन्तित होते हुए बोले, "हे प्रभु! ये आपके सिर पर पट्टी कैसी?" तभी भगवान विष्णु जी बोले "ये तो मेरे भक्त का प्रसाद है।" इतना सुन कर अजमाल जी प्रभु के सामने भावुक हो गए और अपनी अश्रुधारा के साथ अपनी पीड़ा का प्रभु के सामने वर्णन करने लगे।

 

अजमाल जी की पीड़ा सुनकर भगवान विष्णु ने उन्हें यह वचन दिया कि आप निश्चिंत होकर अपने गृहनगर की और प्रस्थान करे मैं स्वयं भादवा सुदी बीज को आपके घर अवतार लूँगा। यह सुनकर अजमाल जी आश्वासित तो हो गए परन्तु उन्होंने पूछा कि "हे प्रभु! मुझ

अज्ञानी को यह कैसे पता चलेगा कि आप पधारे हो?" 
         तब प्रभु बोले-


भादुड़ा री बीज रो जद चंदो करे प्रकाश।
रामदेव बण आवसुं राखीजे विश्वास ।।


अर्थात जब भादवा सुदी बीज (दूज) को चन्द्र दर्शन होगा तब आपके राजमहल में कुमकुम के पगलियों से मेरा आगमन होगा।


यह आश्वासन पाकर अजमाल जी ने प्रभु विष्णु से विदा ली और वापिस अपने राज्य की ओर प्रस्थान किया। एक महीने बाद भादवे की दूज का वह दिन भी आ गया जिसका कि अजमाल जी बड़ी उत्सुकता से इन्तजार कर रहे थे।


}kfjdk/kh’k ने अपने वचनानुसार चन्द्र दर्शन होते ही राजमहल में कुमकुम के पगलियों के साथ अवतार लिया। कुमकुम के पगलियों और पालने में नन्हे रामदेव को देख अजमाल जी अत्यंत ही प्रसन्न हुए ओर यह शुभ समाचार रानी मैणावती को सुनाने के लिए गए। रानी मैणावती हर्ष से भागती हुई पालने की तरफ आई तभी बालक रामदेव ने उफनते हुए दूध को शांत करवा कर माता मैणादे को प्रथम परचा (चमत्कार) दिया, यह देखकर माता मन ही मन प्रभु की लीला को समझ गयी ओर बालक रामदेव को गोद में ले लिया।

परचा गैलेरी :
 
 
1. माता मैणादे को परचा

भादवे की दूज को रामदेवजी ने जब अवतार लिया तब अजमल जी रानी मेंणावती को यह समाचार सुनाने हेतु गये । रानी ने आकर देखा तो पालने में दो बालक, एक तो वीरमदेव जिन्होंने माता मैणादे की गर्भ से जन्म लिया था और एक रामदेव सो रहे थे । यह देख

माता मैणादे मन ही मन चिंता में पड़ गयी । वे इसे प्रभु की लीला को न समझ कर कोई जादू-टोना समझने लगी । उसी समय बालक रामदेव ने रसोईघर में उफन रहे दूध को शांत करवा कर माता मैणादे को अपनी लीला दिखाई और माता का संशय समाप्त हो गया,उन्होंने ख़ुशी से रामदेव को अपनी गोद में ले लिया ।

2. रूपा दर्जी को परचा

बाबा रामदेव ने बचपन में अपनी माँ मैणादे से घोडा मंगवाने की जिद कर ली थी । बहुत समझाने पर भी बालक रामदेव के न मानने पर आखिर थक हारकर माता ने उनके लिए एक दर्जी (रूपा दर्जी) को एक कपडे का घोडा बनाने का आदेश दिया तथा साथ ही साथ उस दर्जी

को कीमती वस्त्र भी उस घोड़े को बनाने हेतु दिए ।घर जाकर दर्जी के मन में पाप आ गया और उसने उन कीमती वस्त्रों की बजाय कपडे के पूर (चिथड़े) उस घोड़े को बनाने में प्रयुक्त किये और घोडा बना कर माता मैणादे को दे दिया । माता मैणादे ने बालक रामदेव को कपडे का घोडा देते हुए उससे खेलने को कहा, परन्तु अवतारी पुरुष रामदेव को दर्जी की धोखधडी ज्ञात थी । अतःउन्होने दर्जी को सबक सिखाने का निर्णय किया ओर उस घोडे को आकाश मे उड़ाने लगे । यह देख माता मैणादे मन ही मन में घबराने लगी उन्होंने तुरंत उस दर्जी को पकड़कर लाने को कहा । दर्जी को लाकर उससे उस घोड़े के बारे में पूछा तो उसने माता मैणादे व बालक रामदेव से माफ़ी माँगते हुए कहा की उसने ही घोड़े में धोखधड़ी की हैं और आगे से ऐसा न करने का वचन दिया । यह सुनकर रामदेव जी वापस धरती पर उतर आये व उस दर्जी को क्षमा करते हुए भविष्य में ऐसा न करने को कहा ।

 

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मान्यताएं :
 
घोड़लियो

घोड़लियो अर्थात घोडा, बाबा की सवारी के लिए पूजा जाता है कहते है बाबा रामदेव ने बचपन में अपनी माँ मैणादे से घोडा मंगवाने की जिद कर ली थी. बहुत समझाने पर भी बालक रामदेव के न मानने पर आखिर थक हारकर माता ने उनके लिए एक दरजी ( रूपा दरजी) को एक कपडे का

घोडा बनाने का आदेश दिया तथा साथ ही साथ उस दरजी को कीमती वस्त्र भी उस घोड़े को बनाने हेतु दिए.घर जाकर दरजी के मन में पाप आ गया और उसने उन कीमती वस्त्रों की बजाय कपडे के पूर( चिथड़े) उस घोड़े को बनाने में प्रयुक्त किये ओर घोडा बना कर माता मैणादे को दे दिया माता मैणादे ने बालक रामदेव को कपडे का घोड़ा देते हुए उससे खेलने को कहा परन्तु अवतारी पुरुष रामदेव को दरजी की धोखाधड़ी ज्ञात थी. अतः उन्होंने दरजी को सबक सिखाने का निर्णय किया ओर उस घोड़े को आकाश में उड़ाने लगे यह देखकर माता मैणादे मन ही मन में घबराने लगी उन्होंने तुरंत उस दरजी को पकड़ कर लाने को कहा दरजी को लाकर उससे उस घोड़े के बारे में पूछा तो उसने माता मैणादे व बालक रामदेव से माफ़ी मांगते हुए कहा कि उसने ही घोड़े में धोखाधड़ी की है ओर आगे से ऐसा न करने का वचन दिया. यह सुनकर रामदेव जी वापिस धरती पर उतर आये व उस दरजी को क्षमा करते हुए भविष्य में ऐसा न करने को कहा इसी धारणा के कारण ही आज भी बाबा के भक्तजन पुत्ररत्न की प्राप्ति हेतु बाबा को कपडे का घोडा बड़ी श्रद्धा से चढाते है |

       
 
        
 
        
 
       

 

मेला :
 

रामदेवरा में प्रतिवर्ष भादवा सुदी दूज से भादवा सुदी एकादशी तक एक विशाल मेला भरता हैं. यह मेला दूज को मंगला आरती के साथ ही शुरू होता हैं. सांप्रदायिक सदभाव के प्रतीक इस मेले में शामिल होने व मन्नतें मांगने के लिए राजस्थान ही नहीं गुजरात, महाराष्ट्र, पंजाब,

हरियाणा,मध्यप्रदेश व अन्य राज्यों से भी लाखों की तादाद में श्रद्धालुजन पहुंचते है.

कोई पैदल तो कोई यातायात के वाहनों के माध्यम से रामदेवरा पहुंचता है. रुणिचा पहुंचते ही वहा की छठा अनुपम लगती है. मेले के दिनों में "रुणिचा" नई नगरी बन जाता हैं. मेले के अवसर पर जम्में जागरण आयोजित होते हैं तथा भंडारों की भी व्यवस्था होती हैं.

 

मेले में कई किलोमीटर लम्बी कतारों में लग कर भक्तजन बाबा के जय-जयकार करते हुए दर्शन हेतु आगे बढ़ते हैं. इस मेले के अवसर पर पंचायत समिति एवं राज्य सरकार पूर्ण व्यवस्था करने में जुटी रहती हैं.

 

इस मेले के अतिरिक्त माघ माह में भी मेला भरता हैं. उसे "माघ मेला" कहा जाता है. जो लोग भादवा मेले की भयंकर भीड़ से ऊब जाते हैं वे "माघ मेले" में अवश्य शामिल होते है तथा मंदिर में श्रद्धाभिभुत होकर धोक लगाते है.

 

मेले का द्रश्य लुभावना, मनभावन, मनमोहक एवं सदभाव और भाईचारे का प्रतीक सा सभी को अनुभव होता है. सभी यात्रियों के मुख से एक ही संबोधन "जय बाबे री" निकलता प्रतित होता है.

 

 
 

 

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