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RAJPUT WOMEN

 

छवि राजावत : नए जमाने की सरपंच

MBA डिग्रीधारी व दिल्ली के कार्पोरेट जगत में काम कर चुकी छवि राजावत आजकल राजस्थान के टोंक जिले के सोढा गांव की सरपंच है , इनके बारे में ज्यादा जानने के लिए चित्र पर क्लिक करे , यह चित्र इंडिया टूडे पत्रिका में छपे एक लेख का है |

 

उस राज कन्या ने मेवाड़ का भाग्य बदल दिया

चित्र गूगल से साभार 
 तुर्क हमलावर अलाउद्दीन खिलजी ने जैसे तैसे चितौड़ जीत कर अपने चाटुकार मालदेव को मेवाड़ का सूबेदार बना दिया था | युध्ध में रावल रतन सिंह सहित चितौड़ के वीरो ने केसरिया बाना पहन कर आत्माहुति  दी | खिलजी की मौत के बाद मुहम्मद तुगलक दिल्ली का सुलतान बना तो मालदेव ने उसकी अधीनता स्वीकार कर ली | सीसोदा की जागीर को छोड़कर लगभग सारा मेवाड़ तुर्कों के कब्जे में था और सिसोदा के राणा हम्मीर सिंह को इसी का दुःख था |

बापा रावल की सैंतीस्वी पीढी के रावल करण सिंह ने जब अपने बड़े बेटे क्षेम सिंह को मेवाड़ की बागडोर सौंपी तो छोटे बेटे राहप को राणा की पदवी दे सिसोदा की बड़ी जागीर दे दी | केलवाडा इस ठीकाने की राजधानी था | रावल क्षेम सिंह के वंश में आगे चल कर रावल रतन सिंह हुए | राणा राह्प के वंशज अरि सिंह इनके समकालीन थे और खिलजी से युध करते हुए राणा अरि सिंह ने भी रावल रतन सिंह के साथ वीरगति पायी | उन्ही का युवा पुत्र हम्मीर इस समय केलवाडा में मेवाड़ को विदेशी दासता से मुक्त करने  की योजना बना रहा था |

पहले तो हम्मीर ने मालदेव का स्वाभिमान जगाने की कोशिश  की ,पर जिसके खून में ही गुलामी आ गयी हो वह दासता में ही अपना गौरव समझता है | इस लिए उसने उलटे हम्मीर को ही तुर्कों की शरण में आने को क़हा | हमीर ने मालदेव और तुर्कों पर छापेमार कर हमले करने शुरू कर दिए | मालदेव ने इस से बचने के लिए चाल सोची  और हम्मीर को अपनी लड़की की शादी के प्रस्ताव का नारियल भिजवाया |
हम्मीर ने काफी सोचविचार के बाद उस विवाह प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया | और तय समय पर अपने गुप्तचरों और सैनिको के साथ  चितौड़ दुर्ग पहुँच गए | वंहा जाकर दुर्ग का निरिक्षण किया | विवाह के बाद उनका साक्षात्कार राजकुमारी सोनगिरी से हुआ  तो राजकुमारी ने हाथ जोड़ कर निवेदन किया " महाराज मै आपके शत्रु की कन्या हूँ इसलिए मै आपके योग्य नहीं हूँ मेरे पिता तुर्कों  के साथ है लेकिन मै आपका साथ देकर  मातृभूमि के लिए संघर्ष करूंगी | "
हम्मीर उसकी देशभक्ती से प्रभावित हुए वे बोले " देवी अब आप सिसोदा की रानी है | अब आपका लक्ष्य भी हमारा लक्ष्य है | हम मिल कर मेवाड़ की स्वतन्त्रता की लड़ाई लड़ेंगे |"

सोनगिरी ने क़हा महाराज अप देहेज में दीवान मौजा राम मोहता को मांग लीजिये वे बहुत नीतिग्य और देश भक्त है |
मालदेव ने सोचा की मोहता अपने लिए गुप्तचरी करेंगे यह समझ कर उनहोने सहर्ष हम्मीर की बात मान दीवान मोहता को उनके साथ कर दिया | हमीर की विदाई रानी और मोहता के साथ कर दी गयी | दुर्ग के कपाट बंद कर किलेदार को आदेश दिया गया की आज से हम्मीर या उनका कोइ सैनिक  इस किले में ना आ पाये |
थोड़ी दूर जाने पर दीवान मोहता ने हम्मीर से क़हा की महाराज मालदेव आपको असावधान  करके केलवाड पर हमला  करने की फिराक में है | लेकीन  अभी  तुगलक ने उसे सेना सहित सिंगरौली बुलाया है | वह कूच करने वाला है | इस लिए चितौड़ विजय का इससे अच्छा मौका नहीं मिलेगा |

मोहता  की बात सुन कर हम्मीर ने पास के ही जंगल में डेरा डाल दिया  और मालदेव के सिंगरौली जाने का इन्तजार करने लगे | जैसे हे उन्हें  अपने गुप्तचरों के द्वारा  मालदेव के बाह जाने का सन्देश मिला अपने सैनिको को इकठ्ठा करके वापस किले की तरफ रवाना हो गए | राणा हम्मीर भी स्त्री वेष में हो लिए और मोहता मोजा राम को आगे कर दिया | खुद पालकी में बैठ गए | रात्री का समय हो गया था किले के दरवाजे पर जाकर आवाज लगाई "द्वारा खोलो मै दीवान मोजा राम मोहता हूँ , राजकुमारी पीहर आयी है | किले दार ने झांक कर देखा तो उन्हें मोजा राम पालकी के साथ दिखाई दिए तो उन्हें कोइ ख़तरा ना जान और मोजा राम तो अपने आदमी है तथा आदेश केवल राणा  हम्मीर के लिए ही था सो किले दार ने ज्यादा बिचार किये बिना द्वार खोल दिए | अन्दर घुसते ही राणा हम्मीर और सैनिको ने द्वार रक्षक सैनिको  का काम तमाम कर दिया | अगले द्वार पर भी यही प्रक्रिया दोहराई गयी | किले में मालदेव के थोड़े से ही सैनिक थे इस लिए बात ही बात में किले पर राणा हमीर का कब्जा हो  गया | सुबह की पहली किरन के साथ ही केसरिया ध्वज लहरा दिया गया |

माल देव को पता लगा तो वह उलटे पैर चितौड़ की ओर दोड़ा पर हम्मीर ने उसे रास्ते में ही दबोच लिया | उसके सैनिक भी हम्मीर के साथ हो लिए | अब बिना समय गवाए हम्मीर ने सिंगरौली में बैठे तुगलक पर हमला बोल दिया उसके सैनिक भाग गए और तुगलक पकड़ा गया | तीन महीने तक कारागृह में रहने के बाद मेवाड़ के साथ साथ अजमेर व नागौर के इलाके पचास लाख  रूपये  और सो हाथी देकर अपने प्राण बचाए |

राणा हम्मीर अब पूरे मेवाड़ के महाराणा हो गए | यहीं से मेवाड़ के शिशोदिया वंश का काल खंड शुरू हुआ | राष्ट्र भक्त क्षत्राणी महारानी सोनगिरी ने राष्ट्र - हित में अपने पिता को त्याग कर मेवाड़ को पुन भारत का मुकुट बना दिया |    

 

 

असिस्टेंट कमान्डेंट राज्यश्री राठौड़ :राजस्थान की पहली महिला पायलट

नागौर जिले के मकराना पंचायत समिति के इटावा गांव के रहने वाले सामाजिक कार्यकर्ता,लेखक औरजोगसंजोग.कॉम के मोडरेटर ठाकुर मगसिंह जी राठौड़ की २२ वर्षीय पुत्री राज्यश्री राठौड़ को राजस्थान की पहली महिला पायलट बनने का गौरव हासिल हुआ है | एक मध्यमवर्गीय परिवार से सम्बन्ध रखने व गच्छीपुरा जैसे छोटे गांव से शिक्षा की शुरुआत करने वाली राज्यश्री राठौड़ आजकल एजिमाला स्थित इंडियन नेवल एकेडमी में असिस्टेंट कमान्डेंट पायलट डिफेन्स का प्रशिक्षण ले रही है |
अमेरिका स्थित फ़्लाइंग स्कूल एयर-डी से फलाइंग का प्रशिक्षण लेने के बाद राज्यश्री ने देश की सेवा करने के जज्बे के चलते प्राइवेट एयरलाइन्स में ऊँची आमदनी वाली नौकरी करने के बजाय इंडियन कोस्ट गार्ड चुना | 

अपनी मेहनत और लगन से अपने बचपन के सपनों की ऊँची हसरत पूरी कर कामयाबी की ऊँचाइयाँ छूने वाली राज्यश्री राठौड़ को हार्दिक बधाईयाँ और शुभकामनाएँ | सुश्री राज्यश्री राठौड़ उन राजपूत लड़कियों की भी प्रेरणाश्रोत बनेगी जो अपनी जिन्दगी में कुछ खास करके ऊँचाइयाँ छूना चाहती है | राज्यश्री ने यह भी साबित कर दिखाया कि यदि प्रतिभा हो तो शिक्षा गांव में लें या शहर में कोई फर्क नहीं पड़ता |








 

 

बीच युद्ध से लौटे राजा को रानी की फटकार


बात जोधपुर की चल रही है तो यहाँ के अनेक राजाओं में एक और यशस्वी राजा जसवंत सिंह जी और उनकी हाड़ी रानी जसवंत दे की भी चर्चा करली जाए | महाराज जसवन्त सिंह जी ने दिल्ली की और से बादशाह शाहजहाँ और औरंगजेब की और से कई सफल सैनिक अभियानों का नेतृत्व किया था तथा जब तक वे जीवित रहे तब तक औरंगजेब को कभी हिन्दू धर्म विरोधी कार्य नही करने दिया चाहे वह मन्दिर तोड़ना हो या हिन्दुओं पर जजिया कर लगना हो , जसवंत सिंह जी के जीते जी औरंगजेब इन कार्यों में कभी सफल नही हो सका | २८ नवम्बर १६७८ को काबुल में जसवंत सिंह के निधन का समाचार जब औरंगजेब ने सुना तब उसने कहा " आज धर्म विरोध का द्वार टूट गया है " | 
ये वही जसवंत सिंह थे जिन्होंने एक वीर व निडर बालक द्वारा जोधपुर सेना के ऊँटों की व उन्हें चराने वालों की गर्दन काटने पर सजा के बदले उस वीर बालक की स्पष्टवादिता,वीरता और निडरता देख उसे सम्मान के साथ अपना अंगरक्षक बनाया और बाद में अपना सेनापति भी | यह वीर बालक कोई और नही इतिहास में वीरता के साथ स्वामिभक्ति के रूप में प्रसिद्ध वीर शिरोमणि दुर्गादास राठौड़ था |
महाराज जसवंत सिंह जिस तरह से वीर पुरूष थे ठीक उसी तरह उनकी हाड़ी रानी जो बूंदी के शासक शत्रुशाल हाड़ा की पुत्री थी भी अपनी आन-बाण की पक्की थी | १६५७ ई. में शाहजहाँ के बीमार पड़ने पर उसके पुत्रों ने दिल्ली की बादशाहत के लिए विद्रोह कर दिया अतः उनमे एक पुत्र औरंगजेब का विद्रोह दबाने हेतु शाजहाँ ने जसवंत सिंह को मुग़ल सेनापति कासिम खां सहित भेजा | उज्जेन से १५ मील दूर धनपत के मैदान में भयंकर युद्ध हुआ लेकिन धूर्त और कूटनीति में माहिर औरंगजेब की कूटनीति के चलते मुग़ल सेना के सेनापति कासिम खां सहित १५ अन्य मुग़ल अमीर भी औरंगजेब से मिल गए | अतः राजपूत सरदारों ने शाही सेना के मुस्लिम अफसरों के औरंगजेब से मिलने व मराठा सैनिको के भी भाग जाने के मध्य नजर युद्ध की भयंकरता व परिस्थितियों को देखकर ज्यादा घायल हो चुके महाराज जसवंत सिंह जी को न चाहते हुए भी जबरजस्ती घोडे पर बिठा ६०० राजपूत सैनिकों के साथ जोधपुर रवाना कर दिया और उनके स्थान पर रतलाम नरेश रतन सिंह को अपना नायक नियुक्त कर औरंगजेब के साथ युद्ध कर सभी ने वीर गति प्राप्त की |इस युद्ध में औरग्जेब की विजय हुयी | 
महाराजा जसवंत सिंह जी के जोधपुर पहुँचने की ख़बर जब किलेदारों ने महारानी जसवंत दे को दे महाराज के स्वागत की तैयारियों का अनुरोध किया लेकिन महारानी ने किलेदारों को किले के दरवाजे बंद करने के आदेश दे जसवंत सिंह को कहला भेजा कि युद्ध से हारकर जीवित आए राजा के लिए किले में कोई जगह नही होती साथ अपनी सास राजमाता से कहा कि आपके पुत्र ने यदि युद्ध में लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त किया होता तो मुझे गर्व होता और में अपने आप को धन्य समझती | लेकिन आपके पुत्र ने तो पुरे राठौड़ वंश के साथ-साथ मेरे हाड़ा वंश को भी कलंकित कर दिया | आख़िर महाराजा द्वारा रानी को विश्वास दिलाने के बाद कि मै युद्ध से कायर की तरह भाग कर नही आया बल्कि मै तो सेन्य-संसाधन जुटाने आया हूँ तब रानी ने किले के दरवाजे खुलवाये | लेकिन तब भी रानी ने महाराजा को चाँदी के बर्तनों की बजाय लकड़ी के बर्तनों में खाना परोसा और महाराजा द्वारा कारण पूछने पर बताया कि कही बर्तनों के टकराने की आवाज को आप तलवारों की खनखनाहट समझ डर न जाए इसलिए आपको लकड़ी के बर्तनों में खाना परोसा गया है | रानी के आन-बान युक्त व्यंग्य बाण रूपी शब्द सुनकर महाराज को अपनी रानी पर बड़ा गर्व हुआ |

 

 

रानी पद्मिनी

रावल समरसिंह के बाद उनका पुत्र रत्नसिंह चितौड़ की राजगद्दी पर बैठा | रत्नसिंह की रानी पद्मिनी अपूर्व सुन्दर थी | उसकी सुन्दरता की ख्याति दूर दूर तक फैली थी | उसकी सुन्दरता के बारे में सुनकर दिल्ली का तत्कालीन बादशाह अल्लाउद्दीन खिलजी पद्मिनी को पाने के लिए लालायित हो उठा और उसने रानी को पाने हेतु चितौड़ दुर्ग पर एक विशाल सेना के साथ चढ़ाई कर दी | उसने चितौड़ के किले को कई महीनों घेरे रखा पर चितौड़ की रक्षार्थ तैनात राजपूत सैनिको के अदम्य साहस व वीरता के चलते कई महीनों की घेरा बंदी व युद्ध के बावजूद वह चितौड़ के किले में घुस नहीं पाया |
तब उसने कूटनीति से काम लेने की योजना बनाई और अपने दूत को चितौड़ रत्नसिंह के पास भेज सन्देश भेजा कि "हम तो आपसे मित्रता करना चाहते है रानी की सुन्दरता के बारे बहुत सुना है सो हमें तो सिर्फ एक बार रानी का मुंह दिखा दीजिये हम घेरा उठाकर दिल्ली लौट जायेंगे | सन्देश सुनकर रत्नसिंह आगबबुला हो उठे पर रानी पद्मिनी ने इस अवसर पर दूरदर्शिता का परिचय देते हुए अपने पति रत्नसिंह को समझाया कि " मेरे कारण व्यर्थ ही चितौड़ के सैनिको का रक्त बहाना बुद्धिमानी नहीं है | " रानी को अपनी नहीं पुरे मेवाड़ की चिंता थी वह नहीं चाहती थी कि उसके चलते पूरा मेवाड़ राज्य तबाह हो जाये और प्रजा को भारी दुःख उठाना पड़े क्योंकि मेवाड़ की सेना अल्लाउद्दीन की विशाल सेना के आगे बहुत छोटी थी | सो उसने बीच का रास्ता निकालते हुए कहा कि अल्लाउद्दीन चाहे तो रानी का मुख आईने में देख सकता है |
अल्लाउद्दीन भी समझ रहा था कि राजपूत वीरों को हराना बहुत कठिन काम है और बिना जीत के घेरा उठाने से उसके सैनिको का मनोबल टूट सकता है साथ ही उसकी बदनामी होगी वो अलग सो उसने यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया |

चितौड़ के किले में अल्लाउद्दीन का स्वागत रत्नसिंह ने अथिती की तरह किया | रानी पद्मिनी का महल सरोवर के बीचों बीच था सो दीवार पर एक बड़ा आइना लगाया गया रानी को आईने के सामने बिठाया गया | आईने से खिड़की के जरिये रानी के मुख की परछाई सरोवर के पानी में साफ़ पड़ती थी वहीँ से अल्लाउद्दीन को रानी का मुखारविंद दिखाया गया | सरोवर के पानी में रानी के मुख की परछाई में उसका सौन्दर्य देख देखकर अल्लाउद्दीन चकित रह गया और उसने मन ही मन रानी को पाने के लिए कुटिल चाल चलने की सोच ली जब रत्नसिंह अल्लाउद्दीन को वापस जाने के लिए किले के द्वार तक छोड़ने आये तो अल्लाउद्दीन ने अपने सैनिको को संकेत कर रत्नसिंह को धोखे से गिरफ्तार कर लिया |
रत्नसिंह को कैद करने के बाद अल्लाउद्दीन ने प्रस्ताव रखा कि रानी को उसे सौंपने के बाद ही वह रत्नसिंह को कैद मुक्त करेगा | रानी ने भी कूटनीति का जबाब कूटनीति से देने का निश्चय किया और उसने अल्लाउद्दीन को सन्देश भेजा कि -" मैं मेवाड़ की महारानी अपनी सात सौ दासियों के साथ आपके सम्मुख उपस्थित होने से पूर्व अपने पति के दर्शन करना चाहूंगी यदि आपको मेरी यह शर्त स्वीकार है तो मुझे सूचित करे | रानी का ऐसा सन्देश पाकर कामुक अल्लाउद्दीन के ख़ुशी का ठिकाना न रहा ,और उस अदभुत सुन्दर रानी को पाने के लिए बेताब उसने तुरंत रानी की शर्त स्वीकार कर सन्देश भिजवा दिया |
उधर रानी ने अपने काका गोरा व भाई बादल के साथ रणनीति तैयार कर सात सौ डोलियाँ तैयार करवाई और इन डोलियों में हथियार बंद राजपूत वीर सैनिक बिठा दिए डोलियों को उठाने के लिए भी कहारों के स्थान पर छांटे हुए वीर सैनिको को कहारों के वेश में लगाया गया |इस तरह पूरी तैयारी कर रानी अल्लाउद्दीन के शिविर में अपने पति को छुड़ाने हेतु चली उसकी डोली के साथ गोरा व बादल जैसे युद्ध कला में निपुण वीर चल रहे थे | अल्लाउद्दीन व उसके सैनिक रानी के काफिले को दूर से देख रहे थे | सारी पालकियां अल्लाउदीन के शिविर के पास आकर रुकीं और उनमे से राजपूत वीर अपनी तलवारे सहित निकल कर यवन सेना पर अचानक टूट पड़े इस तरह अचानक हमले से अल्लाउद्दीन की सेना हक्की बक्की रह गयी और गोरा बादल ने तत्परता से रत्नसिंह को अल्लाउद्दीन की कैद से मुक्त कर सकुशल चितौड़ के दुर्ग में पहुंचा दिया | 
इस हार से अल्लाउद्दीन बहुत लज्जित हुआ और उसने अब चितौड़ विजय करने के लिए ठान ली | आखिर उसके छ:माह से ज्यादा चले घेरे व युद्ध के कारण किले में खाद्य सामग्री अभाव हो गया तब राजपूत सैनिकों ने केसरिया बाना पहन कर जौहर और शाका करने का निश्चय किया | जौहर के लिए गोमुख के उतर वाले मैदान में एक विशाल चिता का निर्माण किया गया | रानी पद्मिनी के नेतृत्व में १६००० राजपूत रमणियों ने गोमुख में स्नान कर अपने सम्बन्धियों को अन्तिम प्रणाम कर जौहर चिता में प्रवेश किया | थोडी ही देर में देवदुर्लभ सोंदर्य अग्नि की लपटों में स्वाहा होकर कीर्ति कुंदन बन गया | जौहर की ज्वाला की लपटों को देखकर अलाउद्दीन खिलजी भी हतप्रभ हो गया | महाराणा रतन सिंह के नेतृत्व में केसरिया बाना धारण कर ३०००० राजपूत सैनिक किले के द्वार खोल भूखे सिंहों की भांति खिलजी की सेना पर टूट पड़े भयंकर युद्ध हुआ गोरा और उसके भतीजे बादल ने अद्भुत पराक्रम दिखाया बादल की आयु उस वक्त सिर्फ़ बारह वर्ष की ही थी उसकी वीरता का एक गीतकार ने इस तरह वर्णन किया -
बादल बारह बरस रो,लड़ियों लाखां साथ |
सारी दुनिया पेखियो,वो खांडा वै हाथ ||

इस प्रकार छह माह और सात दिन के खुनी संघर्ष के बाद 18 अप्रेल 1303 को विजय के बाद असीम उत्सुकता के साथ खिलजी ने चित्तोड़ दुर्ग में प्रवेश किया लेकिन उसे एक भी पुरूष,स्त्री या बालक जीवित नही मिला जो यह बता सके कि आख़िर विजय किसकी हुई और उसकी अधीनता स्वीकार कर सके | उसके स्वागत के लिए बची तो सिर्फ़ जौहर की प्रज्वलित ज्वाला और क्षत-विक्षत लाशे और उन पर मंडराते गिद्ध और कौवे | 
रत्नसिंह युद्ध के मैदान में वीरगति को प्राप्त हुए और रानी पद्मिनी राजपूत नारियों की कुल परम्परा मर्यादा और अपने कुल गौरव की रक्षार्थ जौहर की ज्वालाओं में जलकर स्वाहा हो गयी जिसकी कीर्ति गाथा आज भी अमर है और सदियों तक आने वाली पीढ़ी को गौरवपूर्ण आत्म बलिदान की प्रेरणा प्रदान करती रहेगी |

चितौड़ यात्रा के दौरान पद्मिनी के महल को देखकर स्व.तनसिंह जी ने अपनी भावनाओं को इस तरह व्यक्त किया -
यह रानी पद्मिनी के महल है | अतिथि-सत्कार की परम्परा को निभाने की साकार कीमतें ब्याज का तकाजा कर रही है; जिसके वर्णन से काव्य आदि काल से सरस होता रहा है,जिसके सोंदर्य के आगे देवलोक की सात्विकता बेहोश हो जाया करती थी;जिसकी खुशबू चुराकर फूल आज भी संसार में प्रसन्ता की सौरभ बरसाते है उसे भी कर्तव्य पालन की कीमत चुकानी पड़ी ? सब राख़ का ढेर हो गई केवल खुशबु भटक रही है-पारखियों की टोह में | क्षत्रिय होने का इतना दंड शायद ही किसी ने चुकाया हो | भोग और विलास जब सोंदर्य के परिधानों को पहन कर,मंगल कलशों को आम्र-पल्लवों से सुशोभित कर रानी पद्मिनी के महलों में आए थे,तब सती ने उन्हें लात मारकर जौहर व्रत का अनुष्ठान किया था | अपने छोटे भाई बादल को रण के लिए विदा देते हुए रानी ने पूछा था,- " मेरे छोटे सेनापति ! क्या तुम जा रहे हो ?" तब सोंदर्य के वे गर्वीले परिधान चिथड़े बनकर अपनी ही लज्जा छिपाने लगे; मंगल कलशों के आम्र पल्लव सूखी पत्तियां बन कर अपने ही विचारों की आंधी में उड़ गए;भोग और विलास लात खाकर धुल चाटने लगे | एक और उनकी दर्दभरी कराह थी और दूसरी और धू-धू करती जौहर यज्ञ की लपटों से सोलह हजार वीरांगनाओं के शरीर की समाधियाँ जल रही थी |
कर्तव्य की नित्यता धूम्र बनकर वातावरण को पवित्र और पुलकित कर रही थी और संसार की अनित्यता जल-जल कर राख़ का ढेर हो रही थी |
रावल समरसिंह के बाद उनका पुत्र रत्नसिंह चितौड़ की राजगद्दी पर बैठा | रत्नसिंह की रानी पद्मिनी अपूर्व सुन्दर थी | उसकी सुन्दरता की ख्याति दूर दूर तक फैली थी | उसकी सुन्दरता के बारे में सुनकर दिल्ली का तत्कालीन बादशाह अल्लाउद्दीन खिलजी पद्मिनी को पाने के लिए लालायित हो उठा और उसने रानी को पाने हेतु चितौड़ दुर्ग पर एक विशाल सेना के साथ चढ़ाई कर दी | उसने चितौड़ के किले को कई महीनों घेरे रखा पर चितौड़ की रक्षार्थ तैनात राजपूत सैनिको के अदम्य साहस व वीरता के चलते कई महीनों की घेरा बंदी व युद्ध के बावजूद वह चितौड़ के किले में घुस नहीं पाया |
तब उसने कूटनीति से काम लेने की योजना बनाई और अपने दूत को चितौड़ रत्नसिंह के पास भेज सन्देश भेजा कि "हम तो आपसे मित्रता करना चाहते है रानी की सुन्दरता के बारे बहुत सुना है सो हमें तो सिर्फ एक बार रानी का मुंह दिखा दीजिये हम घेरा उठाकर दिल्ली लौट जायेंगे | सन्देश सुनकर रत्नसिंह आगबबुला हो उठे पर रानी पद्मिनी ने इस अवसर पर दूरदर्शिता का परिचय देते हुए अपने पति रत्नसिंह को समझाया कि " मेरे कारण व्यर्थ ही चितौड़ के सैनिको का रक्त बहाना बुद्धिमानी नहीं है | " रानी को अपनी नहीं पुरे मेवाड़ की चिंता थी वह नहीं चाहती थी कि उसके चलते पूरा मेवाड़ राज्य तबाह हो जाये और प्रजा को भारी दुःख उठाना पड़े क्योंकि मेवाड़ की सेना अल्लाउद्दीन की विशाल सेना के आगे बहुत छोटी थी | सो उसने बीच का रास्ता निकालते हुए कहा कि अल्लाउद्दीन चाहे तो रानी का मुख आईने में देख सकता है |
अल्लाउद्दीन भी समझ रहा था कि राजपूत वीरों को हराना बहुत कठिन काम है और बिना जीत के घेरा उठाने से उसके सैनिको का मनोबल टूट सकता है साथ ही उसकी बदनामी होगी वो अलग सो उसने यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया |

चितौड़ के किले में अल्लाउद्दीन का स्वागत रत्नसिंह ने अथिती की तरह किया | रानी पद्मिनी का महल सरोवर के बीचों बीच था सो दीवार पर एक बड़ा आइना लगाया गया रानी को आईने के सामने बिठाया गया | आईने से खिड़की के जरिये रानी के मुख की परछाई सरोवर के पानी में साफ़ पड़ती थी वहीँ से अल्लाउद्दीन को रानी का मुखारविंद दिखाया गया | सरोवर के पानी में रानी के मुख की परछाई में उसका सौन्दर्य देख देखकर अल्लाउद्दीन चकित रह गया और उसने मन ही मन रानी को पाने के लिए कुटिल चाल चलने की सोच ली जब रत्नसिंह अल्लाउद्दीन को वापस जाने के लिए किले के द्वार तक छोड़ने आये तो अल्लाउद्दीन ने अपने सैनिको को संकेत कर रत्नसिंह को धोखे से गिरफ्तार कर लिया |
रत्नसिंह को कैद करने के बाद अल्लाउद्दीन ने प्रस्ताव रखा कि रानी को उसे सौंपने के बाद ही वह रत्नसिंह को कैद मुक्त करेगा | रानी ने भी कूटनीति का जबाब कूटनीति से देने का निश्चय किया और उसने अल्लाउद्दीन को सन्देश भेजा कि -" मैं मेवाड़ की महारानी अपनी सात सौ दासियों के साथ आपके सम्मुख उपस्थित होने से पूर्व अपने पति के दर्शन करना चाहूंगी यदि आपको मेरी यह शर्त स्वीकार है तो मुझे सूचित करे | रानी का ऐसा सन्देश पाकर कामुक अल्लाउद्दीन के ख़ुशी का ठिकाना न रहा ,और उस अदभुत सुन्दर रानी को पाने के लिए बेताब उसने तुरंत रानी की शर्त स्वीकार कर सन्देश भिजवा दिया |
उधर रानी ने अपने काका गोरा व भाई बादल के साथ रणनीति तैयार कर सात सौ डोलियाँ तैयार करवाई और इन डोलियों में हथियार बंद राजपूत वीर सैनिक बिठा दिए डोलियों को उठाने के लिए भी कहारों के स्थान पर छांटे हुए वीर सैनिको को कहारों के वेश में लगाया गया |इस तरह पूरी तैयारी कर रानी अल्लाउद्दीन के शिविर में अपने पति को छुड़ाने हेतु चली उसकी डोली के साथ गोरा व बादल जैसे युद्ध कला में निपुण वीर चल रहे थे | अल्लाउद्दीन व उसके सैनिक रानी के काफिले को दूर से देख रहे थे | सारी पालकियां अल्लाउदीन के शिविर के पास आकर रुकीं और उनमे से राजपूत वीर अपनी तलवारे सहित निकल कर यवन सेना पर अचानक टूट पड़े इस तरह अचानक हमले से अल्लाउद्दीन की सेना हक्की बक्की रह गयी और गोरा बादल ने तत्परता से रत्नसिंह को अल्लाउद्दीन की कैद से मुक्त कर सकुशल चितौड़ के दुर्ग में पहुंचा दिया | 
इस हार से अल्लाउद्दीन बहुत लज्जित हुआ और उसने अब चितौड़ विजय करने के लिए ठान ली | आखिर उसके छ:माह से ज्यादा चले घेरे व युद्ध के कारण किले में खाद्य सामग्री अभाव हो गया तब राजपूत सैनिकों ने केसरिया बाना पहन कर जौहर और शाका करने का निश्चय किया | जौहर के लिए गोमुख के उतर वाले मैदान में एक विशाल चिता का निर्माण किया गया | रानी पद्मिनी के नेतृत्व में १६००० राजपूत रमणियों ने गोमुख में स्नान कर अपने सम्बन्धियों को अन्तिम प्रणाम कर जौहर चिता में प्रवेश किया | थोडी ही देर में देवदुर्लभ सोंदर्य अग्नि की लपटों में स्वाहा होकर कीर्ति कुंदन बन गया | जौहर की ज्वाला की लपटों को देखकर अलाउद्दीन खिलजी भी हतप्रभ हो गया | महाराणा रतन सिंह के नेतृत्व में केसरिया बाना धारण कर ३०००० राजपूत सैनिक किले के द्वार खोल भूखे सिंहों की भांति खिलजी की सेना पर टूट पड़े भयंकर युद्ध हुआ गोरा और उसके भतीजे बादल ने अद्भुत पराक्रम दिखाया बादल की आयु उस वक्त सिर्फ़ बारह वर्ष की ही थी उसकी वीरता का एक गीतकार ने इस तरह वर्णन किया -
बादल बारह बरस रो,लड़ियों लाखां साथ |
सारी दुनिया पेखियो,वो खांडा वै हाथ ||

इस प्रकार छह माह और सात दिन के खुनी संघर्ष के बाद 18 अप्रेल 1303 को विजय के बाद असीम उत्सुकता के साथ खिलजी ने चित्तोड़ दुर्ग में प्रवेश किया लेकिन उसे एक भी पुरूष,स्त्री या बालक जीवित नही मिला जो यह बता सके कि आख़िर विजय किसकी हुई और उसकी अधीनता स्वीकार कर सके | उसके स्वागत के लिए बची तो सिर्फ़ जौहर की प्रज्वलित ज्वाला और क्षत-विक्षत लाशे और उन पर मंडराते गिद्ध और कौवे | 
रत्नसिंह युद्ध के मैदान में वीरगति को प्राप्त हुए और रानी पद्मिनी राजपूत नारियों की कुल परम्परा मर्यादा और अपने कुल गौरव की रक्षार्थ जौहर की ज्वालाओं में जलकर स्वाहा हो गयी जिसकी कीर्ति गाथा आज भी अमर है और सदियों तक आने वाली पीढ़ी को गौरवपूर्ण आत्म बलिदान की प्रेरणा प्रदान करती रहेगी |

 

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so helpful info........great efforts.....

(paramvir singh parmar, 2013-06-07 12:33)

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(madhav singh, 2013-03-13 09:13)

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(mukesh sisodia, 2013-03-13 09:08)

rajput are the bravest in this world....THANKS Bhati

surendar

(surendar bhati, 2013-02-12 18:39)

nice hai bhati history koi dekhna chahta hai to dekhiye my blog
surendarbhatihistory.blogspot.com

GREAT .......SO NICE..BANNA

(BHAWANI SINGH SHEKHAWAT, 2013-02-04 14:26)

NEW GENERATION WILL FIND IT VERY INFORMATIVE FULL OF KNOWLEDGE.....THANKS A LOT FOR THIS JOB. ENRICH THE SITE

a great rendetion...................

(lakshya raj indoriya, 2012-03-09 08:21)

bana grt job u did via dis website... am jst over whelmed to go thru such web site, keep on flowing. gud luck :)

Re: a great rendetion...................

(pabusingh solanki, 2013-01-31 11:35)

great rajputana

Re: a great rendetion...................

(hitendrasinh jadeja, 2012-03-15 13:25)

jai mataji kya aap ne jadeja vans ki histri ka kuch apload kiya hai aap ka yeh prayog aflatun hai bhai

RAJPUT

(Vishal Singh Rajput, 2012-12-22 07:03)

Have A Nice Day

SUB KA MALIK AK

(VIJAY SINGH RANA, 2012-12-05 12:51)

JO HAME PEYDA KERTA OR JEVEN MAY ACHEY BURE BATO PER JO HUM NESCHEY LETEY HEN JO SHAKTEE ATIHEY GOD IS POWER

balu

(shingrule, 2012-09-12 14:06)

balu

Re: balu

(shingrule, 2012-09-12 14:08)

9421396974 b m shingrule rajput bhamta aurangabad

jai mewar

(kuldeep singh rathore tityari, 2012-08-22 11:30)

kshtraniyo k tyag or balidan aaj hindu kul ke liye swarn aabhusno se bhi badh kr h

WELL DONE

(HEENA PURAWAT, 2012-02-29 04:12)

GREAT WORK HKM GOOD KNOWLEDGE

Re: WELL DONE

(asifmewati, 2012-08-13 21:34)

you are great woman

aan ke pke Rajput

(rajender, 2012-08-02 05:03)

aaj rajputo ko ek baar phir jgaane ki jroort h

Lohaghar

(Pushpendra Singh Parmar, 2012-06-28 09:11)

I Proud Of My Rajput Banna & Baisa

mertiya

(ganga singh rathore , 2012-06-20 13:50)

jay mata ji ki sa hukam aap to rajput samaj k bara m to bahut kuch jano ho sa

AJARI ROYALS

(Sonpal Singh Bhati, Thikana- Sirohi(Raj.), 2012-06-05 12:12)

Nice collection Hukum, But soory to say please remove your picture. any way thanks for collecting Rajputs history..... Go ahead Banna....

I proud of RAJPUTANA

(Deshraj Singh Hada, 2012-05-30 09:16)

Good collection & good job hukum


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